Saturday, April 23, 2011

किताबों से रखें पक्की दोस्ती
i-next reporter
MEERUT (22 April): कहते हैं बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में लोग किताबों से दूर हुए हैं, जिससे जीवन के प्रति लोगों का नजरिया बदला है. शनिवार को व‌र्ल्ड बुक डे है. जो मौका है किताबों से दोस्ती करने का और बेहतरीन जीवन जीने के फलसफे को सीखने का.
बरकरार है किताब का महत्व
कंप्यूटर, इंटरनेट, वीडियो गेम आदि की दुनिया में किताबों का महत्व आज भी बरकरार है. किताबें पढ़ने से जहां भावनात्मक परिपक्वता आती है, नॉलेज बढ़ता है, वहीं कल्पना शक्ति का भी निर्माण होता है. अगर बात करें कहानियों की दुनिया की तो आपको लगेगा कि रिश्तों की बारीकियों को समझने और उसे डील करने में भी कहानी बहुत मदद करती है.
History of world book day
हर साल 23 अप्रैल को व‌र्ल्ड बुक डे मनाया जाता है. इस दिन स्पेनिश लेखक माइगुएल डी सवेंटस का निधन हुआ था. 1923 में स्पेन के एक बुक सेलर ने उनकी याद में पहली बार बुक डे मनाया था. यह संयोग ही है कि 23 अप्रैल मॉरिस डुआनॅ, व्लदिमीर नेबोकाव मेनुएल मीजा आदि लेखकों का बर्थडे भी है. इन सभी लेखकों को याद करने के लिए यूनेस्को ने 1995 से व‌र्ल्ड बुक डे मनाने की शुरूआत की. अगर किताबों की महत्ता को करीब से जानना चाहते हैं तो व‌र्ल्ड बुक डे पर अपनी मनपसंद कोई एक किताब जरूर पढि़ए और फिर देखिए आप विचारों की एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाएंगे.
कब पढ़ें
कुछ लोग अक्सर कहते हैं कि नॉवेल, कविता और कहानी, बायोग्राफी, यात्रा वृतांत पढ़ने के लिए समय कहां है. लेकिन यह हकीकत नहीं, बल्कि बहाना है. पढ़ने के लिए समय निकालना पड़ता है. हिंदी, इंग्लिश, उर्दू, फारसी व अन्य भाषाओं की सैकड़ों किताबें है. आप रोज रात को सोने से पहले कोई एक किताब पढ़ने का समय तय कर सकते हैं. इसी तरह छुंट्टी के दिन एक कहानी या नॉवेल शुरू कर सकते हैं. टूर पर हैं तो भी पढ़ने का अच्छा मौका होता है. तो शुरू हो जाइये..

Tuesday, June 15, 2010

पैरेंटिंग ट्रिक्स

आज के इस आघुनिक दौर में बच्चों को संभालना और उनका सही मार्गदर्शन करना काफी मुश्किल होता जा रहा है। पैरेंटिंग आजकल पैरेंट्स के लिए एक चैलेंज बन गया है।

आज के इस आघुनिक दौर में बच्चों को संभालना और उनका सही मार्गदर्शन करना काफी मुश्किल होता जा रहा है। पैरेंटिंग आजकल पैरेंट्स के लिए एक चैलेंज बन गया है। यदि बच्चो को समझदारी से हैंडल न किया गया गया तो उनके दिलोदिमाग पर खराब असर हो सकता है। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चो अनुशासित, जिम्मेदार और सबकी आँखों का तारा बने और आप आदर्श माता-पिता कहलाएं तो ये पैरेंटिंग ट्रिक्स आजमाएं।


1. बच्चो की सभी बातों मे मीन-मेख न निकालें और न ही बात-बात में उसे रोकें-टोकें। बच्चो को प्यार से समझाएं। उसके दोस्तो के सामने उसे डाटे नही ,उसे इस बात का बुरा लगेगा।
2. आपका बच्चा जब कोई अच्छा काम करें तो उसकी प्रशंसा करना न भूलें। माता-पिता की प्रशंसा बच्चो के अंदर आत्मविश्वास जगाती है और भविष्य में वो और भी अच्छा परफार्म करता है।
3. बच्चों को बचपन से ही "सारी" और "थैंक्यू" जैसे श्ब्दों का प्रयोग करना सिखांए। घर आए मेहमानों और बडे-बुजुर्गो का सम्मान करना सिखांए। अच्छे आचरण के बीज बचपन में ही बोए जा सकते हैं।
4. कभी-कभी बच्चो की जिद भी मान लें। जिद करना तो बाल सुलभ स्वभाव है। थोडी समझदारी से उसके इस स्वभाव को हैंडल करें तो उसकी यह आदत घीरे-घीरे स्वत: ही कम हो जाएगी।
5. आमतौर पर पैरेंट्स बोलते हैं और बच्चो को उनकी बात सुननी पडती है। बच्चो को भी बोलने का मौका दें,उनकी बातो को घ्यान से सुनें। बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि बच्चों को अपनी बात कहने का मौका दिया जाए तो उन्हे दिशा देना आसान हो जाता है।
6. बच्चों से फ्रेंड्ली रहें परन्तु एक सीमा तक ही । अपना पैरेंटल अघिकार बनाएं रखें और अनुशासन में रखकर बच्चो को जरूरी दिशा निर्देश दें।
7. दूसरे बच्चों से अपने बच्चों की तुलना न करें। इससे बच्चों में सुपिरियोरिटी काम्प्लेक्स या हीन भावना उत्पन्न हो सकती हैं। हर बच्चा दूसरे से अलग होता है। उसके अच्छे गुणों को उभारना हर माता-पिता जिम्मेदारी होती है।
8. बच्चो में शुरू से ही शेयरिंग की आदत डालें। उसे अपने खिलौने या चॉकलेट अपने दोस्तों या भाई- बहनो के साथ मिल-बांटकर खेलना खाना सिखाएं। इस तरह वो बचपन से ही सोशल होना सीखेगा।
9. अपने बच्चों में ईष्र्या-द्वेष की भावना न पनपने दें, न ही ओवर रिएक्ट करें।
10. बच्चो अनुशासन घर से ही सीखतें हैं अत:बच्चों को जिम्मेदार व अनुशासित बनाने से पहले स्वय अनुशासित व जिम्मेदार बनें।
11. बच्चों को अपने पारिवारिक या आपसी झगडों का हिस्सा न बनाएं और न ही उन्हें मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करें।
12. बच्चो से बहुत अघिक अपेक्षांए न करें। अक्सर पैरेंट्स अपनी अघूरी महत्वकांक्षा बच्चों के जरिए पूरी करना चाहते हैं और इसके लिए वो बच्चों पर दबाव डालते हैं ,जो सही नहीं है।
13. बच्चों को अनुशासन सिखाएं, लेकिन उन्हें अनुशासन के दायरे में बाघकर न रखें। अनुशासन के दायरे में बांघकर रखने से बच्चो का समुचित विकास नहीं हो पाता।
14. बच्चों के सामने गाली-गलौज या अपशब्दों का इस्तेमाल न करें और न ही बच्चों के सामने अनावश्यक झूठ बोलें क्योकी जैसा आप बोलेगे उसका प्रभाव निश्चित रूप से आपके बच्चो पर पडेगा।
15. बच्चों के लिए भी वक्त निकालें। बच्चों की दिनचर्या में शामिल होना भी बच्चों के सम्पूर्ण विकास का हिस्सा है।
16. कोई भी फंक्शन या फैमिली गेट- टुगेदर हो तो बच्चों को साथ जरूर ले जाएं। इससे बच्चो सोशल बनतें हैं। हमारी परंपराओं से बच्चो बहुत कुछ सीखते हैं।
17. बच्चो के सवालों पर या उसकी किसी जिज्ञासा पर उसे डांटकर चुप न कराएं बल्कि समझदारी पूर्वक उसके सवालों का जवाब दें और उसकी जिज्ञासाओं को शांत करें। इससे बच्चा भ्रमित नहीं होगा।
18. बच्चों को इतनी छूट भी न दें की वो लापरवाह बन जाएं। बच्चों को कोई भी स्वतंत्रता समय से पहले व जरूरत से ज्यादा न दें, ताकि वो चीजों व भावनाओं की कद्र करना जानें।
19. बच्चो को आत्मनिर्भर बनना सिखाएं। उसके छोटे-छोटे काम उसे स्वय करने दें। ऎसा करने से वो बचपन से ही जिम्मेदार व आत्मनिर्भर बनेगा।
20. बच्चो की प्रथम पाठशाला उसका घर होता है अत: अपने बच्चो के सामने सभ्यता से बोलें और अच्छा आचरण करें। क्योकी जैसा आप बोलेगें और जैसा आचरण आप करेगें वैसा ही आपका बच्चा सीखेगा।
इन सब बातों का घ्यान रखकर और उपरोक्त बातों को अपनी व अपने बच्चो की दिनचर्या में शामिल कर के आप भी एक आदर्श माता-पिता बन सकतें हैं।



Wednesday, June 2, 2010

मामला प्राइवेसी का है

इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स को लेकर खबरों का बाजार एक बार फिर से गर्म है. हाल के दिनों में अलग-अलग मौकों पर ये साइट्स कई बार चर्चा में आई. कभी महज दोस्तों के बीच चैट और हल्की-फुल्की बातों को लेकर, तो कभी गंभीर मुद्दों पर होने वाली बहस को लेकर. कभी ट्विटर पर किसी के कमेंट को लेकर, तो कभी किसी मुहिम के चलते भी इन पर बहस हुई. देश और दुनिया भर से जुड़े कई मामलों पर इन साइट्स ने एक रोचक बहस को जन्म दिया. छोटी-छोटी इंफॉर्मेशंस को तेजी से और ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच शेयर करने का जरिया भी रही हैं ये सोशल नेटवर्किग साइट्स. मगर इस बार मामला उल्टा है. इस बार बहस का मुद्दा खुद ये साइट्स बन गई हैं. मामला व‌र्ल्ड की लीडिंग सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से जुड़ा है. अचानक खबर फैली कि फेसबुक पर लोगों का पर्सनल डेटा लीक होने का खतरा है. इसके बाद तो जैसे तूफान सा आ गया है. जितनी बेकरारी के साथ लोग इससे जुड़े थे उससे कहीं ज्यादा तेजी से लोगों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी है. इससे जुड़े करोड़ों लोगों में आशंका और एक अनजाना भय पैदा हो गया है. हालांकि बाद में कई तरह के तर्क देकर ऐसी बातों को खारिज किया जा रहा है, लेकिन चिंता होनी स्वाभाविक है. आखिर मामला प्राइवेसी का है. दरअसल अब यह साइट्स महज स्कूल और कॉलेज जाने वाले स्टूडेंट्स का टाइम पास भर नहीं रह गई हैं. इनसे अरबों लोग जुड़े हैं. इनके पीछे ग्लोबल होती दुनिया में एक दूसरे से कनेक्ट रहने का मकसद भी है और चाहत भी. मीडिया से लेकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां भी अब इन्हें गंभीरता से लेती हैं. कई नामी कंपनियां तो सफलतापूर्वक इन साइट्स पर अपने लिये कैडिंडेट खोज रही हैं. अगर सोशल नेटवर्किंग साइट्स चाहती हैं कि आगे भी उनकी पॉपुलैरिटी बनी रहे और जिस तेजी से सोसाइटी का हर तबका इससे जुड़ रहा है, वह सिलसिला चलता रहे, तो उन्हें प्राइवेसी के रूल्स को सख्त बनाना होगा, ताकि यूजर्स की प्राइवेसी और उसका सम्मान बना रहे.

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Tuesday, June 1, 2010

फिर उड़ने की तमन्ना है..

गुड मॉर्निग!
क्या मौसम है? कभी पारा हाई, कभी आंधी आई. कभी निकले पसीना तो कभी दिल कहे मुझे और है जीना. वाह! क्या तुकबंदी है! आई एम तो टू गुड. वैसे कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि मैं अगर चिड़िया होती तो कितना मजा आता. कितने गाने बने हैं पंछियों पर, जैसे- मैं बन की चिड़िया बन के बन-बन बोलूं रे..पंछी बनूं, उड़ती फिरूं मस्त गगन में, पंख होते तो उड़ आती रे.. वगैरह वगैरह..वगैरह..मतलब ये कि मेरा आइडिया ओरिजनल नहीं है. बहुत से लोग हैं जो पंछी बनना चाहते हैं, शायद आप भी. तो जी आज तो हमारी बात पंछी बनने पर ही होगी. सवाल ये है कि हम पंछी बनना क्यों चाहते हैं? जवाब है ना मेरे पास. किसे नहीं अच्छा लगता कि वो बिना बंधनों के आजादी महसूस करे. जो मन में आये, वो कर सके. चिंताओं से दूर रहे. हम सभी चाहते हैं एक स्ट्रेसफ्री लाइफ. पर स्ट्रेस भी आता कहां से है? हम से ही..घबराइये नहीं मैं आपको कोई लेक्चर नहीं देने वाली हूं. मैं तो आपको पंछी बनाने वाली हूं. आइये हम एक साथ उड़ान भरें.
सबसे पहले सुबह उठिये. आई मीन सुबह पांच बजे. घर में खुली जगह तो तलाशिये, वो आपका आंगन भी हो सकता है और बालकनी भी. बस, उस खुली जगह पर पहुंच जाइये और अपने दोनों हाथों को चिड़िया के पंखों की तरह फैला लीजिए, अपनी गर्दन को पीछे की ओर करिये ताकि आपकी नाक को ताजा अनइंट्रप्टेड एयर सप्लाई मिले. अब हल्के-हल्के उस ताजी हवा को इनहेल करिये और अपने हाथों को पंखों की तरह मूव करिये. ट्रस्ट मी, ये जो मैं आपको बता रही हूं ये कोई योगासन नहीं है, बल्कि लाइफ में फील गुड फैक्टर लाने वाला पंछी आसन है.
मेरे फील गुड तरीकों में एक और असरदार तरीका है. खुद से जोर-जोर बात करना. ये बातें आप अकेले नाइट वॉक करते हुए भी कर सकते हैं या फिर शीशे के आगे खड़े होकर भी. जगह अपनी सुविधा से चू़ज करिये. यकीन मानिये बहुत असरदार तरीका है यह. जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी, तब तो फ्रिक्वेंटली इसका यूज करती थी, पर अब टाइम थोड़ा कम मिलता है और वो भी देर रात तो मैं अपने भगवान जी के मंदिर में बैठकर उनसे ही वार्तालाप कर लेती हूं. पर उसके बाद बड़ी अच्छी रिलेक्स्ड फीलिंग आती है. एक और तरीका है मेरे पास जो आजकल मैंने अपनाया हुआ है. ढेर सारे यात्रा वीसीडीज खरीदकर लाई हूं और रात को सोने से पहले उन्हें देखती हूं. खूबसूरत पेड़, पहाड़, नदियां ये सब देखकर तरावट आ जाती है दिमाग में.
वैसे एक छोटी सी बात तो रह ही गई. वो यह कि अपने आंसू पीना छोड़ दीजिए. गौर करिये बच्चे जब इरीटेटेड होते हैं, परेशान होते हैं तो जोर-जोर से रोते हैं ना और उसके बाद वो कितने मस्त हो जाते हैं. पर जब हम बड़े होने लगते हैं तो अपने आंसू छुपाने लगते हैं और अपनी जिंदगी खुद ही स्ट्रेसफुल बना लेते हैं. कुछ नहीं कर सकते हैं तो अकेले में खुलकर रो ही लीजिए दिल हल्का हो जायेगा और फिर नये सिरे से सोचना शुरू कर सकते हैं स्ट्रेस फ्री होकर.
ये कुछ मेरे तरीके हैं जो मैंने शेयर किये आपके साथ. आप अपने स्टाइल का तरीका अपना लीजिए और फिर मुझे बताइयेगा कि कौन सा तरीका सबसे असरदार रहा आपके लिए. अगली मुलाकात तक अपना ख्याल रखियेगा.

(Writer is a programming head and popular radio jockey)